अपने डर को ताकत में बदलो | A Motivational Buddhist Story On Life

Gautam buddha life story in hindi: भीडभाड से अलग होकर जब भी कोई इंसान अपने साथ अकेले में समय बिताता है, तभी उसके दिमाग में नाना प्रकार की चिंताएं जन्म लेने लगती है। मनुष्य की प्रवृति ही ऐसी है की वो ज्यादातर समय नकारात्मक ही सोचता है। अपने लक्ष्य को कैसे प्राप्त किया जाए, ये सोचने की जगह है। वो ये सोचता है कि अगर लक्ष्य पूरा नहीं हुआ तो मैं क्या करूँगा?

और इस प्रकार की नकारात्मक विचारधारा के कारण जीवन परांत डर डर कर जीता रहता है। अगर पूरी बुद्धिमानी और सजगता के साथ इस डर को समझाना जाए तो यही डर इंसान के पतन का कारण बनता है। ऐसा मनुष्य जो खुद पर संजय करता है, खुद पर संदेह करता है, भला वो कैसे सफल हो सकता है? लेकिन बुद्धिमानी से अगर इस डर का उपयोग किया जाए तो यही डर उसकी सबसे बडी ताकत बन सकता है। काश केवल एक बार उसने खुद पर विश्वास किया होता तो उसे मालूम होता है कि उसके डर में ही उसकी ताकत का रहस्य छुपा हुआ है।

ये कहकर सन्यासी चुप हो गया और चुपचाप अपने कदमों पर ध्यान लगाते हुए जंगली घास पे से आगे बढने लगा। संध्या का समय था सन्यासी और एक लकडहारा जंगल में से होकर गांव की तरफ निकल रहे थे। सन्यासी के ये शब्द लकडहारे को कुछ समझ में नहीं आए। वो सोच रहा था कि डर में ताकत कैसे हो सकती है? डर तो आदमी को कमजोर बनाता है। अपने मन की उत्सुकता को जब वह काबू नहीं कर सका तो उसने सन्यासी से पूछा कि महात्मा ना आप ये क्या कह रहे हैं कि डर में ताकत होती है, डर तो आदमी को कमजोर बनाता है, उसे तो अपना डर दूर करना चाहिए। करारा अपनी बात पूरी कर पाता उससे पहले ही उसे एक शेर की दहाड सुनाई दी।

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शेर की करजन सुनकर लकडहारे का रोम रोम काँप गया। उसके कान खडे हो गए। जंगल से आती एक एक आहट उसे साफ सुनाई दे रही थी। उसके कदम वहीं पर जम गए थे, वो भी नहीं पा रहा था। उसे पता था कि थोडी सी हरकत उसकी जान जोखिम में डाल सकती है। उसका दिल तो तेजी के साथ धडक रहा था लेकिन फिर भी वो अपनी सांसों पर काबू पाने का प्रयास कर रहा था। कुछ देर बाद जब खतरा टल गया तब सन्यासी ने कहना शुरू किया सन्यासी ने कहा कि अभी जब तुम डरे हुए थे

तो तुम्हारे सरीर का रोम रोम जाग गया था। जंगल से आ रही छोटी से छोटी आहट पर भी तुम्हारा ध्यान लगा हुआ था, तो इस प्रकार अपने मन के डर के कारण तुम होश में आ पाए, तुम पूरा ध्यान लगा पाए। इससे पहले जब तक तुम्हें शेर की दहाड सुनाई नहीं दी थी, तब तक तुम अपने विचारों में खोए हुए थे, लेकिन जैसे ही तुम्हें शेर की दहाड सुनाई दी वैसे ही तुम्हारे सारे विचार गायब हो कर हम वर्तमान में उपस्थित हो गए थे।

यदि तुम्हें अभी शेर से बचकर भागना होता या फिर उससे लडना होता तो तुम्हें अपने शरीर की वो क्षमता देखने को मिलती जो आज तक जीवन में तुमने खुद भी महसूस नहीं की होगी। जब कोई कुत्ता तुम्हारे पीछे दौडता है, उस समय तुम्हारी जो रफ्तार होती है वो तुम्हारी आम जिंदगी से कहीं ज्यादा होती है। साधारण जीवन में तुम इतने तेज नहीं दौड पाओगे जितना की एक कुत्ते के सामने दौड पाओगे। ये ताकत या कहें कि हमारे शरीर की क्षमता अभी देखने को मिलती है।

जब हमारा मन दर में होता है किसी डरावनी परिस्थिति में हमारा मस्तिष्क और हमारा शरीर अपने उच्चतम श्रेणी में काम करता है। जो काम तुम आम जिंदगी में नहीं कर पाते वो तुम्हें डरा कर कराया जा सकता है। जहाँ पर भी तुम्हें डर का एहसास होता है, वहीं पर तुम्हारी इन्द्रियां पूर्ण रूप से सक्रिय हो जाती है। तुम्हारे कानों की सुनने की क्षमता तेज हो जाती है, दृष्टि एक टक हो जाती है, पूरी सजग हो जाती है, सक्रियता बढ जाती है। और जैसे जैसे वो डर खत्म होता है, वैसे वैसे तुम सुप्त अवस्था में चले जाते हो। तुम सो जाते हो और तुम्हारे इन्द्रिय फिर से आराम की स्थिति में चली जाती है।

सन्यासी ने लकडहारे से कहना जारी रखा कि परीक्षा से 1 दिन पहले जो याद करने की तुम्हारी गति होती है, वो साधारण याद करने की क्षमता से कहीं तेज होती है। सिर्फ एक बार याद किया हुआ तुम्हें परीक्षा के समय याद रह जाता है और तुम जानते हो कि ये सब परीक्षा के डर से ही होता है। इसीलिए डर को दूर करने की जगह इंसान को ये सोचना चाहिए कि वो अपने डर को ताकत कैसे बना सकता है? जिसप्रकार सुख और दुख प्रकाश और अंधेरा एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं,

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उसी प्रकार डर और ताकत भी एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं। जिसप्रकार रौशनी के बिना अंधेरा पूर्ण नहीं होता। सुख के बिना दुखपूर्ण नहीं होता, उसी प्रकार डर के बिना ताकत का भी कोई महत्त्व नहीं है। लकडहारा सन्यासी के ज्ञान से बहुत प्रभावित हुआ। उनके चरणों में नतमस्तक हो गया और उनसे पूछा कि महात्मा अंधेरे को तो दिया जलाकर रौशनी से भरा जा सकता है लेकिन अपने डर को ताकत में कैसे बदले? इसके लिए कोई उपाय बताएं? इस पर सन्यासी ने कहा कि डर दो प्रकार के होते हैं,

सबसे पहला मानसिक डर और दूसरा शारीरिक डर। सन्यासी ने लकडहारे को समझाते हुए कहना शुरू किया कि मान लो तुम्हें जंगल से होकर गुजरना है। और अचानक तुम पाते हो कि तुम्हारे मन में शेर का ख्याल आ गया। अभी तक प्रत्यक्ष रूप में शेर तुम्हारे सामने नहीं आया है ना उसकी दाढ सुनाई दिए मतलब दूर दूर तक कोई अंदेशा नहीं है कि जंगल में शेर मौजूद हैं, लेकिन शेर का ख्याल आने से तुम्हारे मन में एक डर पनप गया। अब तुम्हारा उठने वाला एक एक कदम उसी डर से अभिभूत होगा।

हर समय तुम्हारे मन में यही ख्याल चलेगा कि कहीं शेर ना जाए, ये शेर वर्तमान में तुम्हारे सामने नहीं है। यह तुम्हारी बहु विषयक की कल्पना है। इसी प्रकार जो मनुष्य अतीत और भविष्य की चिंताओं में डूबा रहता है, वो मानसिक डर का शिकार होता चला जाता है। इसी विडंबना के कारण वो अपने जीवन में जीतने भी निर्णय लेता है। वो सारे मानसिक डर से ग्रसित होते हैं। इसीलिए ज्यादातर मनुष्य पूर्ण रूप से अपने निर्णय पर भरोसा नहीं कर पाते हैं और यही निर्णय या फिर फैसले जो आधे मन से लिए जाते हैं,

मनुष्य के कार्य को पूरा नहीं होने देते। लेकिन ये भी सत्य है कि मानसिक डर के कारण ही इंसान अपनी तैयारी पूरी करता है। अगर तुम्हारे मन में शेर का ख्याल नहीं आएगा तो तुम शेर से सुरक्षा के लिए कोई भी कदम नहीं उठाओगे। लेकिन अगर तुम्हें शेर का ख्याल आ गया तो तुम उससे सुरक्षा के लिए कोई ना कोई तरीका जरूर अपनाओगे तो इसीलिए मानसिक दर बेकार नहीं होता। वो आपकी सुरक्षा को और ज्यादा मजबूत भी करता है, लेकिन समस्या तब शुरू होती है।

जब आप चाहकर भी कुछ नहीं कर सकते लेकिन उसके बावजूद आप मानसिक डर झेल रहे होते हो। उदाहरण के लिए कुछ मनुष्य हमेशा ये सोचते रहते हैं कि उन्हें कोई बिमारी ना हो जाए, कहीं उनके साथ कोई दुर्घटना घट जाए, कहीं उनके साथ कोई धोखा ना कर दे। लेकिन इन सब घटनाओं पर उनका कोई ज़ोर नहीं होता है। ये उनके हाथ में नहीं होता है। अगर दुर्घटना होनी होगी तो होगी ही। अगर बिमारी होनी होगी तो होगी ही। अच्छा खानपान और अच्छी दिनचर्या का पालन करने के बाद भी अगर कोई मनुष्य बीमार हो जाता है तो ये उसके नियंत्रण के परे की बात है।

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अपनी तरफ से उसने पूरी कोशिश की और यही उसका कर्तव्य था। उसमें कोई कुछ क्या कर सकता है? जो घटनाएं इंसान की पहुँच के परे होती है वो उनसे भी परेशान होता रहता है। उनसे भी उसका मन घबराता रहता है और यही मानसिक डर उसके पतन का कारण बनता है। और यही मानसिक डर अगर सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए तो मनुष्य समझदार और अनुभवी कहलाएगा। जो इंसान ये सोचता है कि कांटे सिर्फ दर्द देने के लिए ही बने हैं, वो ये भूल जाता है कि कांटे ही फूलों की रक्षा करते हैं। इसी प्रकार एक ज्ञानी मनुष्य किसी भी चीज़ का उपयोग अपने सकारात्मक तरीके से कर सकता है, लेकिन एक अज्ञानी मनुष्य है।

अपनी अज्ञानता वश उन चीजों को भी छोड देता है जो उसके लिए उपयोगी होती है। विवेकशील मनुष्य फेंके गए पत्थरों का भी महल खडा कर लेता है लेकिन एक वैज्ञानिक मनुष्य उन पत्थरों को दूसरों पर फेंकता रहता है। अगर किसी मनुष्य को अपने मानसिक डर को ताकत में बदलना है तो उसके कुछ नियम हैं, कुछ उपाय है सबसे पहला उपाय अपने विचारों का निरीक्षण अगर हम अपने जीवन में अपने विचारों का निरीक्षण करेंगे तो हम पाएंगे कि ज्यादातर विचार हमारे काल्पनिक होते हैं और इसीलिए जो डर उन विचारों के कारण पनपता है वो भी काल्पनिक होता है।

ज्यादा सोचने वाले लोगों को जब सोचने के लिए कुछ नहीं मिलता तो वो निरर्थक बातों के बारे में सोचने लगते हैं। और वो बेकार के विचार उसे तो परेशान करते ही हैं, साथ के साथ उसके परिजनों को उसके सगे संबंधियों को भी परेशान करते हैं। इसीलिए ज्यादा सोचने वाले लोगों को यह समझना चाहिए कि मन में उठ रहे तमाम विचारों में से काम के विचार कौन से हैं और बेकार के विचार कौन से हैं? जो निरर्थक विचार हो, उन्हें दूर करते जाओ और जो सार्थक विचार हो उनको गहराई से सोचना शुरू करो, तभी तुम्हारी समस्याओं के तुम्हारी उलझनों के उपाय निकलेंगे।

मानसिक डर को दूर करने का दूसरा उपाय है उसका सामना करना। इसका मतलब यह नहीं है कि तुम शेर के सामने जाकर खडे हो जाओ, बल्कि इसका मतलब यह है कि पूर्ण सुरक्षा के साथ तुम जंगल में जा रहे हों। यदि जंगल में जाना बहुत आवश्यक है तो तुम शेर के डर से अपने घर पर नहीं बैठ सकते हो। इसी प्रकार मनुष्य के जीवन में बहुत सारे डर होते है जैसे की परीक्षा का डर, लक्ष्य ना पाने का डर, झूठ बोलने का डर, सच के पता लग जाने का डर। अपनों को खो देने का डर, दुर्घटना हो जाने का डर लेकिन जैसे जैसे समय के साथ इन दरों का सामना किया जाता है वैसे वैसे ये डर जीवन से दूर होते चले जाते हैं। अगर तुम इनसे बचने का प्रयास करते हो तो ये जीवन भर तुम्हें सताते रहेंगे।

ये तभी दूर हो सकते हैं जब तुम इनका सामना करो। कुछ लोगों को तो दूसरों के सामने खुलकर बात करने में भी डर लगता है। ऐसे लोगों को अनजान लोगों से बात करनी चाहिए। जितना ही वो लोगों से बात करेंगे उतना ही उनके मन का डर दूर होता जाएगा। मानसिक डर को ताकत में बदलने का तीसरा उपाय है अपने डर को स्वीकार करना। बहुत से लोग अपने जीवन में अपने डर को स्वीकार ही नहीं कर पाते।

अगर आप उनसे पूछेंगे कि उन्हें किस चीज़ से डर लगता है तो वह साफ इनकार कर देंगे कि उन्हें किसी चीज़ से कोई डर नहीं लगता। लेकिन दूसरों की नजरों में ऊंचा उठने के लिए ये झूठ उन्हें बहुत महंगा पडता है। अगर वो अपने डर को स्वीकार करना नहीं सीखेंगे तो वो जीवन प्रयन्त उस दर से मुक्त नहीं हो पाएंगे। इसीलिए समझदारी इसी में है कि अपने डर को स्वीकार कर लिया जाए।

अगर आपको किसी चीज़ से डर लगता है, तो किसीसे शर्मा ने की या झिझकने की जरूरत नहीं है। हर मनुष्य को हर इंसान को किसी ना किसी चीज़ से डर लगता ही है और आप पाएंगे कि जैसे ही आप अपने डर को स्वीकार करते हैं, वैसे ही आपका डर खत्म होना शुरू हो जाता है और जितना ही आप अपने डर को छुपाने की कोशिश करेंगे, आपका डर उतना ही मजबूत होता चला जाता है। ये सारे तरीके तुम्हारे मानसिक डर को दूर कर सकते हैं।

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लेकिन शारीरिक डर को दूर करने के लिए तुम्हें दूसरे तरीके अपनाने होंगे। सबसे पहले ये समझो की शारीरिक डर कौन सा होता है? मानलो तुम किसी जंगल से गुजर रहे हों और अचानक तुम्हारे सामने शेर आ जाता है। तुमने पहले नहीं सोचा था कि शेर तुम्हारे सामने आ सकता है लेकिन जब वो तुम्हारे सामने आता है तो तुम्हारी सारी शारीरिक गतिविधि या शिथिल हो जाती है। तुम्हारी सांसें अटक जाती हैं,

मस्तिष्क काम करना बंद कर देता है और तुम्हारा दिल तेज़ी के साथ धडकने लगता है। तो इसीलिए जब बिन सोंची बात हमारे साथ घटित होती है तो हमारा शरीर उस डर को महसूस कर पाता है और वही सारी रिक डर कहलाता है। ऐसे समय में शारीरिक डर को दूर करने के कुछ उपाय है, कुछ तरीके हैं। सबसे पहला उपाय तो यही है कि अपने ऊपर संयम रखें। जब किसी मनुष्य के साथ बिन सोंची बात घटती है तो सबसे पहले उस का संयम टूट जाता है और संयम टूटने के साथ उसका मस्तिष्क काम करना बंद कर देता है और इसी वजह से सोचने और समझने की प्रक्रिया भी रुक जाती है

क्योंकि हमारा शरीर उसी प्रकार कार्य करेगा। इस प्रकार हमारा मस्तिष्क उसे निर्देश देगा। अगर मस्तिष्क की सोचने समझने की शक्ति खत्म हो गयी तो हमारा शरीर भी शिथिल हो जाता है। तो इसीलिए अगर कठिन समय में मनुष्य अपने ऊपर संयम रखता है तो उसका मस्तिष्क सही तरीके से काम करता है और वो सही निर्णय लेकर उस परिस्थिति से तत्काल बाहर आ सकता है। यहाँ पर दूसरा उपाय समझने का ये है कि जीवन में कुछ भी घटित हो सकता है।

जीवन बडा चमत्कारिक होता है। वो हमारी सोच के अनुरूप नहीं चलता। बल्कि उसमें कुछ भी हो सकता है और यही जीवन की खूबसूरती होती है। अगर आपको आज ही पता चल जाए कि आने वाले 10 साल तक अब क्या कर पाएंगे तो आपकी जीवन में से रुचि खत्म हो जाएगी। लेकिन अगर जीवन एक रहस्यमयी किताब की तरह बना रहेगा तो आप अपने जीवन से कभी नहीं थकेंगे। आपका जीवन आपको आश्चर्यचकित करता रहेगा।

इसीलिए यह समझो कि जीवन में कुछ भी घटित हो सकता है। तुम्हारी सोच से परे भी घटित हो सकता है। इसीलिए कुछ हनुमान मत लगा लेना किसी सोच को लेकर सन्यासी ने अपनी बात खत्म करते हुए कहा कि इन तरीकों से तुम अपने मानसिक और शारीरिक डर को दूर कर सकते हो और आनंद से भरा हुआ जीवन जी सकते हो, तो दोस्तों कैसी लगी? ये कहानी आपको कमेंट सेक्शन में कमेंट करके जरूर बताना। नमो बुद्धाय 🙏

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